बुधवार, 22 फ़रवरी 2017

बच्चे हैं कंपनी के CEO, हुनर जानकर रह जाएंगे हैरान

बचपन में हम अपने पैरेंट या रिलेटिव द्वारा दिए पैसे को जुटाकर खर्च निकालते हैं। जिस उम्र में हम पढ़ाई और खेलकूद करने में पूरा बचपन गुजारते हैं, यदि इस उम्र में यदि कोई कंपनी का मालिक हो तो आपके लिए आश्चर्य वाली बात होगी। जी हां, आज आपको बता रहा है कि भारत के कुछ होनहार छात्र; जिनकी उम्र लगभग 12 से 17 वर्ष की होगी, अपनी कंपनी के मालिक हैं। ये छोटे-छोटे बच्चे न सिर्फ स्कूल जाते हैं बल्कि साथ में अपनी कंपनियां भी चलाते हैं।
खेलकूद-पढ़ाई के अलावा कम उम्र में एक कंपनी का मालिक बनना जुनून और कुछ हटके सोचने पर निर्भर करता है। आइए जानते हैं कि आखिर कम उम्र में कहां से ऐसे आइडियाज आएं, जिससे अपनी कंपनी के सीईओ बन बैठे।




1. 12 साल के अवी ऐसे बने कंपनी के मालिक
गुड़गांव के रहने वाले 13 साल के अवी दयानी बताते हैं कि आज से एक साल पहले एक ऐसी घटना हुई, जिससे उनको अपनी कंपनी खोलने का आइडिया आया। उन्होंने बताया कि किसी काम के लिए मेरी मां विदेश यात्रा के लिए जाने की तैयारी कर रही थीं। उस वक्त घर में काम करने वाली नैनी आना बंद कर दिया, जिसकी वजह से पापा बहुत ही परेशान हुए और पूरा काम उन्होंने अकेले किया। इसको देखते हुए एक आइडिया सूझा कि क्यों न एक कॉल पर काम करने वाली 'नैनी' को बुलाया जा सके, जिसके लिए मैंने 'शैनी' (शॉर्ट सर्विस नैनी) नाम का ऐप तैयार किया।
अवी अभी 7वीं क्लास में पढ़ाई कर रहे हैं। उनके साथ 12 साल के नक्ष कोहली बिजनेस पार्टनर हैं, जोकि स्कूलमेट भी हैं। बातचीत के दौरान नक्ष ने बताया कि सबसे पहले आस-पड़ोस में सर्वे किया गया, जिसमें कई लोग प्रशिक्षित बेबीशीटर को सिर्फ 2 घंटे के काम के लिए 1000 रुपए तक देने को तैयार थे। इसके बाद हम लोगों ने बेबीशीटर से संपर्क करने के लिए कॉलेज स्टूडेंट्स और आस-पास मोहल्ले के वृद्ध महिलाओं की मदद मिली। 'शैनी' ऐप में बेबीशीटर की सभी जानकारियां दी गई। ऐप का मकसद यह था कि एकल परिवार, जहां पति-पति या मां-बाप दोनों ही काम पर जाते हों। 
अवी और नक्ष के इस अनोखे आइडिया को YEA! इंडिया ने इन्हें फर्स्ट प्राइज के रूप में 50,000 रूपए दिए। दोनों ने ही अपनी कंपनी पिछले साल मार्च महीने में रजिस्टर कराई थी।


 
2. ट्रैफिक कम करने के लिए बनाया अनोखा ऐप
17 साल के केविन ठक्कर ने 'मॉय वैले' ऐप तैयार किया, जिसके जरिए अवैध पार्किंग को रोका जा सकता है। यदि आप भीड़-भाड़ वाले इलाके हैं और पार्किंग की जगह नहीं मिल रही है तो ऐसे में आप वैले पार्किंग के जरिए सही और सुरक्षित पार्किंग कर सकेंगे। इस आइडिया के लिए YEA!इंडिया कॉन्टेस्ट में केविन रनर-अप रहे, जिसमें प्राइजमनी के रूप में 40 हजार रूपए मिले थे। 
केविन ने बताया कि लगभग 200 युवाओं से ऑनलाइन सर्वे कराया गया, जिसमें 80 प्रतिशत लोग वैले पार्किंग के लिए पेड करने को तैयार हैं।




3. जुड़वा बच्चों की सक्सेसफुल कहानी
राजस्थान स्थित उदयपुर के जुड़वा बच्चे पाल और चिन वर्धमान जब क्लास दो में पढ़ते थे, तभी से 'डिजिटल विजुअल इफेक्ट' में इंट्रेस्ट दिखाना शुरू कर दिया था। जुड़वा भाईयों की रूचि देखकर इनकी मां मंजु; जोकि खुद भी एक कलाकार हैं, ने भी उन्हें प्रोत्साहन देना शुरू कर दिया। 8 साल की उम्र में पाल को मुंबई के माया एकेडमी में एडवांस सिनेमैटिक कोर्स में दाखिला दिला दिया गया। इसके बाद उदयपुर से 10 साल की उम्र में पाल ने सागा से एडवांस सिनेमैटिक कोर्स करके मुंबई वापस चले गए और स्क्रीनप्ले कोर्स किया। वहीं भाई चिन ने 10 साल की उम्र में मुंबई के इंस्टीट्यूट ऑफ क्रिएटिव एक्सीलेंस से शॉर्ट एक्टिंग कोर्स किया।
4 साल पहले दोनों ने एक साई-फाई (sci-fi) मूवी बनाने का निर्णय लिया, जोकि दो बच्चे और एक एलियन से जुड़ी कहानी थी। इस एनिमेटेड और ग्राफिक्स फिल्म का नाम 'द एडवेंचर ऑफ पालचिनगिरी बिगिन्स', जोकि दोनों भाईयों के नाम था। इस एनिमेटेड फिल्म को नेवादा फिल्म फेस्टिवल के स्टूडेंट कैटेगरी में प्लेटिनम रील अवार्ड से नवाजा गया। दोनों भाई अब 16 साल के हैं और अमेरिका से एडवांस वीएफएक्स की पढ़ाई करने का प्लान कर रहे हैं।




4. कम उम्र में बनाया एप्पल आईफोन के लिए शानदार ऐप
चेन्नई के श्रवण और संजय कुमारन स्टीव जॉब्स से बेहद ही प्रभावित हैं। बचपन में जब बच्चे इंजीनियर-डॉक्टर बनने की बात कहते हैं, उसी उम्र में दोनों भाईयों ने एप्पल ऐप स्टोर के लिए एक ऐप तैयार करने का निर्णय लिया। इनके पिता कुमारन खुद एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर हैं और दोनों बच्चों को कंप्यूटर प्रोग्रमिंग के बेसिक पढ़ाते रहे। 
साल 2011 के दौरान दोनों ने आईओएस वर्जन में  ऑफलाइन चोर-पुलिस गेम 'कैच मी कॉप' का पहला ऐप बनाया। दोनों ने दिसंबर 2011 में पार्टनरशिप फर्म के तहत ऐप को रजिस्टर्ड किया। जिसे एप्पल कंपनी ने पहले तो कुछ तकनीकी गड़बड़ियों के कारण रिजेक्ट कर दिया, लेकिन संशोधन के बाद एक सप्ताह के भीतर स्वीकार कर लिया। श्रवण बताते हैं कि मुझे आज भी याद है कि इस उपलब्धि के लिए डैड केक काट कर सेलिब्रेट किया था। 
इसके बाद दोनों ने 7 आईओएस ऐप डेवलप कर चुके हैं, जोकि न सिर्फ गेमिंग बल्कि प्रेयर, हेल्पलाइन इमरजेंसी नंबर बनाए। इतना ही नहीं, 3 अन्य एंड्राएड ऐप भी बनाए हैं।




5. तीनों छात्रों ने बनाया अनोखा 'जूस'
हैदराबाद में 9वीं के छात्र राघव (14), 10वीं के अरमान (15) और 11वीं की छात्रा प्रणवी वेगेस्ना (16) ने TiE यंग अंत्रप्रेन्योर इवेंट में फर्स्ट प्राइस सिर्फ एक छोटे से आइडिया से जीत लिया। तीनों स्टूडेंट्स ने 'जूसर' नाम का प्रोडक्ट तैयार किया था। राघव ने बताया कि यह जूसर एक मिक्स फ्रूट पाउडर है। जिसमें 95 फीसदी सिर्फ भिन्न-भिन्न फलों से तैयार किया गया है, जिसे 6 महीने तक स्टोर किया जा सकता है। 
वहीं प्रणवी के मुताबिक यह फ्रूट मिक्स पाउडर डायबिटिक और मोटापे से परेशान व्यक्तियों के लिए बेहद फायदेमंद है। राघव की मां योगेश्वरी पेरूमल; जोकि एक BITS पिलानी में फार्मेसी की प्रोफसर हैं, ने फार्मूला बनाने में बेहद मदद की। 



6. क्रिएटिव आइडिया ने बनाया फेमस
दिल्ली के 17 वर्षीय स्टूडेंट जयांश भारतीया ने कम उम्र में एक ऐसी फिल्म बनाई जिसकी काफी तारीफ हुई। 'स्लेट' नाम की यह फिल्म स्कूल जाने वाली एक छोटी बच्ची के ऊपर बनाई गई है, जिसे स्कूल के एक बच्चे ने गिफ्ट में स्लेट देता है जोकि स्कूल जाने में असमर्थ है। डॉक्यूमेंट्री के दौरान जयांश के जीवन में परिवर्तन कर देने वाला एक मोड़ भी आया। पेड़ों और हरियाली से जुड़ी डॉक्यूमेंट्री सीरीज 'स्पीकिंग ट्री' बनाने के दौरान वर्ल्ड वाइल्डलाइफ फंड (डब्ल्यूडब्ल्यूएफ) संस्थान बेहद प्रभावित हुए, जिसे उन डॉक्यूमेंट्री को ट्री कैंपेन के प्रमोशन के लिए स्वीकार कर लिया गया।









शनिवार, 16 जुलाई 2016

घर घर सामान बेचने वाला लड़का कैसे बना इस luxery car कंपनी का डायरेक्टर।

आज जब इकॉनोमिक टाइम्स में छपी इस खबर पर नज़र गई तो बस यही गाना याद आया। सबसे पहले। लेकिन जब पूरी कहानी पढ़ा तब समझ आया कि नहीं इस लड़के ने वक़्त को भी मात दी। वो क्या कहते हैं न, धूल चटा दी।

कौन है ये?

पवन शेट्टी, मुंबई का लड़का। बीकॉम किया और देश के बाकी बेरोज़गारों की तरह बेरोज़गार। साथ में एक और बड़ी मुश्किल, घर का एक करीबी जो बीमार था। उसकी भी देख-रेख करनी है सो अलग। ऐसे ही लगभग एक साल बीत गया। लेकिन पवन को अपनी परेशानी का इल्म था। उसे पता था कि मुंबई में ज़िंदा रहना है तो जल्दी कमाना शुरू करना होगा। एक दिन अखबार में एक विज्ञापन दिखा। अप्लाय कर दिया। नौकरी मिल गई। नौकरी थी सेल्स मैन की। वो वाला सेल्स मैन जो आपके घर तक आकर आपको सामान बेचता है। साल था 1999, आज से ठीक 17 साल पहले।

1999 में पवन फाइनेंसियल एक्सप्रेस का सेल्स मैन था।

पवन कहते हैं कि “मैंने ये काम लगभग 6 महीने तक किया। और यही जॉब थी जिसने मुझे बोलना सिखा दिया। मेरी झिझक अब खत्म हो गई थी। मैं लोगों के दरवाज़े-दरवाज़े जा कर बेचने का काम करता था। और इसके लिए 8-8 किमी तक भी चलना पड़ता था।”

साल आया 2000

“फाइनेंसियल एक्सप्रेस में सेल्स की नौकरी के बाद मेरा मन बैंकिंग में जाने का हुआ। एचएसबीसी में इंटरव्यू दिया। हो गया। लेकिन मेरे पास कोई स्पेशल नॉलेज नहीं थी। तो मुझे जनरल जॉब में रख लिया गया। यहीं से मेरा मन हुआ कि अब MBA करना है। लेकिन इसका भी ध्यान रखना था कि ज्यादा पैसे न खर्च हो जाएं।” CET का टेस्ट दिया और सेलेक्ट हो गया। CET महाराष्ट्र में लिया जाने वाला एक टेस्ट है जो ‘एमबीए’ में एडमिशन के लिए कराई जाती है। एडमिशन मिल गया मुंबई के ही सिडन्ह्म कॉलेज में।

साल 2003, इंटर्न

पवन कहते हैं, “एमबीए करते हुए गुजरात की एक मोटर कम्पनी में इंटर्नशिप का मौका मिला। मैंने लगभग 2 महीने तक इंटर्नशिप की। जिसमें मुझे मोटर कम्पनी के बारे में बहुत कुछ सीखने को मिला।”

साल 2004, टाटा मोटर्स

अब कैंपस में प्लेसमेंट का टाईम था। सभी अपनी-अपनी नौकरियों की तैयारी में थे। पवन भी अपनी नौकरी की तैयारी में था। पवन चाहता था कि किसी ऐसी कम्पनी में नौकरी मिल जाए जो रोजमर्रा के सामान बनाती हो। हिंदुस्तान युनिलीवर कैंपस पहुंची। लेकिन टेंशन में पवन का इंटरव्यू ठीक नहीं हुआ। और नौकरी मिली नहीं। फिर अगली कम्पनी का इंतज़ार था। कम्पनी थी टाटा मोटर्स। इंटरव्यू हुआ, नौकरी मिल गई। प्रोडक्ट अकाउंट मैनेजर के पोस्ट पर काम शुरू हुआ। पवन कहते हैं, “मैं टाटा मोटर्स के मुम्बई ब्रांच में था। वहां छोटी कारों की डील नहीं थी। वहां ट्रक की डील होती थी। एक-एक बार में 100-150 ट्रक की डील होती थी। मेरे पास एक मिनट का भी फ्री टाईम नहीं होता था।”

साल 2007, फोर्ड इंडिया

टाटा मोटर्स में 2 साल तक काम करने के बाद फोर्ड इंडिया से ऑफर मिला। इनके गुजरात का बिज़नेस कुछ ठीक नहीं जा रहा था। उसमें कुछ सुधार करना था। शुरू के 2 साल पवन ने वहां सेल्स का काम देखा। फिर अगले 2 साल तक सेल्स और मार्केटिंग दोनों का काम देखा। गुजरात में फोर्ड की हालत बहुत कुछ सुधर गई थी। और यहां से पवन को कारों का अंदाज़ा भी हो गया था।

साल 2012, लम्बोर्गिनी इंडिया

“अब ये टाईम था जब मैं मुंबई से ज्यादा दूर या बाहर नहीं जाना चाहता था। मुझे दिल्ली वगैरह से ऑफर मिल रहे थे। लेकिन मेरा कहीं जाने का मन नहीं था। लम्बोर्गिनी के बारे में एक कंसलटेंट ने बताया। मुझे उसने बताया कि एक जॉब है, जहां साल में 10-15 कार ही बेचनी है। मैं भी बिना ज्यादा सोचे मीटिंग के लिए पहुंच गया। और जब मुझे कम्पनी का नाम पता चला, मेरी आंखें फटी की फटी रह गईं। यहां मुझे सब कुछ खुद से तैयार करना था। कंपनी के इंडिया ऑपरेशन की शुरुआत करनी थी। तो ऐसा लगा जैसे बिना पैसे लगाए खुद का बिज़नेस तैयार कर रहा हूं।”

साल 2016,पॉर्श इंडिया

इतने सालों तक लम्बोर्गिनी का ऑपरेशन देखने के बाद। अब जब स्विच करना था तो इस बात का भी ध्यान रखना था कि अगली कंपनी इससे बड़ी हो। तो अब हिन्दुस्तान की सड़कों पर दौड़ने वाली सबसे महंगी कारों में से एक पॉर्श इंडिया के डायरेक्टर हो गए हैं, पवन शेट्टी।
पवन का कहना है कि “अब मुझे ये भी देखना था कि बड़ी कम्पनियों में जहां ज्यादा कारों की डील होती है वहां का ऑपरेशन कैसा होता है। और सीखने का मौका भी ज्यादा मिलेगा।”

वैसे आपको बता दें जितनी आसानी से आपने ये 17 साल कुछ लाईनों में पढ़ लिया। ये जर्नी इतनी भी आसान नहीं रही होगी। ये ठीक वैसी ही बात है कि लोग कहते हैं रातों रात बड़ा आदमी बन गया लेकिन कोई ये नहीं समझता है वो रात 17 साल लम्बी थी। उन रातों में कई महीनों की नींद गुम हुई होगी।

शनिवार, 6 जून 2015

अरबपतियों की पहली नौकरी, कोई बेचता था अखबार तो किसी ने धोए बर्तन



न्यूजपेपर बेचने वाला खुद न्यूजपेपर की हेडलाइन बन जाए, सुनने में थोड़ा अजीब लगता है, लेकिन ऐसा हुआ है। ये वो चुनिंदा लोग हैं, जो कभी न्यूजपेपर बांटते थे, तो कभी पिज्जा डिलिवरी का काम किया। लेकिन, आज सफलता इनके कदम चूमती है। कभी अपने पैसे तो कभी अपनी कंपनी को लेकर ये लोग अक्सर अखबारों की सुर्खियों में रहते हैं। इन लोगों की नौकरी की शुरुआत भले ही छोटी थी, लेकिन जुनून, लगन और मेहनत ने आज इन्हें सातवें आसमान में पहुंचा दिया।
मनी भास्कर ऐसे ही कुछ चुनिंदा लोगों की जिंदगी से जुड़ी वो बात बता रहा है, जो हैं तो अरबों रुपए के मालिक, लेकिन इन्होंने अपना करियर छोटे कामों से शुरू किया था।
Amazon.com सीईओ जेफ बिजोस
Amazon.com आज दुनिया की प्रसिद्ध ई-कॉमर्स कंपनियों में से एक है। इसके सीईओ जेफ बिजोस हैं। जेफ के लिए कहा जाता है कि जब वो टीन ऐज में थे तब सबसे पहली नौकरी उन्‍हें मैकडॉनल्‍ड में ग्रिल मैन के रूप में मिली थी। तब जैफ के पिता भी मैकडॉनल्‍ड में काम किया करते थे। बाद में उन्होंने अपनी एक्स गर्लफ्रेंड के साथ बच्चों का समर कैंप लगाने का काम शुरु किया, जिसके लिए वह एक बच्चे की फीस 600 डॉलर चार्ज करते थे। हालांकि, उनके समर कैंप में सिर्फ 6 बच्चों ने ही रजिस्ट्रेशन कराया। पोस्ट ग्रैजुएशन करने के बाद जेफ ने एक स्टार्टअप कपंनी में नौकरी मिली, लेकिन ज्यादा दिन उन्होंने नौकरी नहीं की। अपने बिजनेस माइंड सेट और स्किल्स की मदद से 1994 में उन्होंने ई-कॉमर्स कंपनी अमेजन की स्थापना की।



माइकल डेल
डेल दुनिया की प्रमुख कम्‍प्‍यूटर निर्माता कंपनी है। डेल के फाउंडर एंड सीईओ माइकल डेल का करियर एक चाइनीज रेस्‍त्रां में प्‍लेट धोने से शुरू हुआ था। उस वक्‍त वे महज 12 साल के थे। उसके बाद उन्‍हें वहीं पर पानी सर्व करने की जिम्‍मेदारी दी गई। इसके बाद उन्होंने 15 साल की उम्र में अपनी कमाई से एप्पल का कम्प्यूटर खरीदा, सिर्फ ये देखने के लिए के लिए कि हाईटेक कम्प्यूटर काम कैसे करता है। 1984 में उन्होंने डेल कंपनी को पीसी लिमिटेड के नाम से रजिस्टर कराया।


वारेन बफे
दुनिया के सबसे अमीर व्‍यक्तियों में शूमार वारेन बफे को इनवेस्टेमेंट मैन कहा जाता है। उनके लिए चर्चित है कि वो जहां भी पैसा लगाते हैं मुनाफा होता है। लोग उनसे इनवेस्टमेंट टिप्स लेते हैं, लेकिन वारेन बफे भी बचपन में न्‍यूज पेपर बेचने का काम करते थे। महज 13 साल की उम्र में वे घर-घर जाकर न्‍यूज पेपर डालते थे। आज वो अरबों रुपए का मालिक हैं। उन्होंने फोर्ब्स को दिए एक इंटरव्यू में इस बात का जिक्र किया था। उनके मुताबिक, इनवेस्टमेंट के लिए खुद का पैसा होना जरूरी था, इसलिए वो पार्ट टाइम ये काम किया करते थे।


माइकल ब्लूमबर्ग
माइकल ब्‍लूमबर्ग ग्लोबल फाइनेंशियल डाटा प्रोवाइडर और मीडिया कंपनी के फाउंडर और सीईओ हैं। उन्होंने 1973 में इसकी स्थापना की थी। उस वक्त कंपनी सिर्फ इक्विटी ट्रेडिंग का काम करती थी। माइकल का नाम हाल ही में चर्चा में आया था, जब उन्होंने भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात कर स्‍मार्ट सिटी प्रोजेक्ट में साझेदारी का एलान किया था। दुनिया के अरबपतियों में शुमार माइकल ब्‍लूमबर्ग के बचपन की कहानी भी दिलचस्प है। माइकल कॉलेज में पढ़ाई के दौरान पार्किंग अटेंडेंट का काम भी करते थे।


चार्ल्स श्वाब
चार्ल्‍स श्वाब आज दुनिया के दौलमंदों में शुमार हैं। बचपन वे अचार और अखरोट बेचा करते थे। धीरे धीरे उन्‍होंने चिकन और अंडे बेचना भी शुरू कर दिया था। 14 साल की उम्र में उन्‍हें गोल्‍फ कोर्स में बतौर केडी काम मिल गया। आज वह दुनिया की मशहूर फाइनेंशियल सर्विस कंपनी वॉल्ट बेटिंगर के सीईओ हैं। उन्होंने ये जिम्मेदारी 2008 में संभाली थी।


एप्पल सीईओ टिम कुक
स्टीव जॉब्स के बाद टिम कुक को 1998 में एप्पल का सीईओ नियुक्त किया गया। हालांकि, कुछ लोगों को छोड़कर इससे पहले टिम कुक को ज्यादा लोग नहीं जानते थे। टिम कुक भी अपने खर्चा चलाने के लिए बचपन में न्यूजपेपर बांटते थे। एप्पल से जुड़ने से पहले टिम कुक अलबामा स्थित पेपर मिल में काम किया करते थे।



थॉमस बून पिकंस
दिग्‍गज अमेरिकी कारोबारी थॉमस बून यानी टी बून की गिनती भी दुनिया के चुनिंदा रईसों में होती है। वह अपनी बीपी कैपिटल मैनेजमेंट फंड कंपनी चलाते हैं। 1981 में उन्होंने अपनी कंपनी शुरू की थी। बता दें कि टी बून 12 साल की उम्र में पेपर बांटने जाया करते थे। बून ने कुछ समय तक बतौर ऑपरेटर भी काम किया है।




http://money.bhaskar.com/news-hf/MON-INDU-ECOM-the-first-odds-jobs-of-the-billionaires-latest-news-5014210-PHO.html

न डिग्री-न पैसा, केवल 50 रु. लेकर घर से निकला यह शख्स, अब है अरबपति





 सपने बड़े थे। लेकिन न तो डिग्री थी और न ही पैसा। मगर, कुछ करना था तो 50 रुपए जेब में डालकर घर से निकल पड़े। यह थे केरल के पालघाट में एक कृषि परिवार में जन्मे पीएनसी मेनन। मेनन के पिता केरल में छोटे से कारोबारी थे। वह जब दस साल के थे, तभी उनके पिता की मौत हो गई। इसके बाद उनके परिवार में बिजनेस संभालने वाला कोई नहीं था, क्योंकि मेनन के दादाजी अनपढ़ थे। उनकी मां भी ज्यादातर बीमार रहा करती थीं। यही वजह है कि वह बमुश्किल स्कूली शिक्षा ही ग्रहण कर सके। आज वह करोड़ों की संपत्ति के मालिक हैं। जब वह पहली बार बिजनेस के लिए घर से निकले, तब उनकी जेब में महज 50 रुपए थे। हम आपको बता रहे हैं कि किस तरह मेनन ने ये कामयाबी हासिल की....।
इस तरह शुरू हुआ सफर, पहली बार सुना ओमान का नाम
पीएनसी मेनन कृषि परिवार से थे। बचपन में ही तमाम दिक्कतें झेलने के कारण वह स्नातक नहीं कर सके। उनकी प्रारंभिक शिक्षा त्रिशूर में हुई थी। साल 1976 में उनकी मुलाकात ओमान से आए ब्रिगेडियर सुलेमान अल अदावी से हुई। ब्रिगेडियर उन दिनों भारत मछली पकड़ने वाली बोट खरीदने आए थे। सुलेमान ने मेनन को उनके साथ व्यवसाय शुरू करने का आश्वासन देते हुए ओमान आने का न्योता दिया। ये पहली बार था, जब मेनन ने ओमान का नाम सुना था। घर जाकर उन्होंने ओमान को ग्लोब पर खोजा। बाद में उन्होंने सुल्तान का आमंत्रण स्वीकार किया। दो महीने के भीतर उन्होंने अपना पासपोर्ट बनवाया और ओमान जाने की पूरी तैयारी कर ली। ओमान जाने के समय उनके पास सिर्फ 50 रुपए ही थे, क्योंकि उस समय ओमान जाने वाले भारतीयों को 50 रुपए से ज्यादा ले जाने की इजाजत नहीं थी। ओमान जाने के समय मेनन काफी उत्साहित थे, उनके जेहन में असफलता का भय नहीं था। उन्हें अपने आप पर भरोसा था कि ओमान जाकर कुछ न कुछ काम अवश्य कर ही लेंगे।



लोगों को लगता था, अरब में है अथाह पैसा!
उस जमाने में लोग सोचते थे कि अरब के लोग पैसों की नदी में तैरते हैं। इसी तरह की बातें मेनन ने भी सुनी थीं। लेकिन जब वह ओमान पहुंचे, तो सब कुछ उल्टा लगा। जिस सुलेमान ने मेनन को व्यवसाय शुरू करने के सपने दिखाए थे, दरअसल में वह भी एक मध्यमवर्गीय परिवार से ताल्लुक रखता था। उनके पास व्यवसाय शुरू करने के लिए अधिक पैसे नहीं थे। बाद में दोनों ने मिलकर वहां के एक बैंक से शुरुआत में 3000 रियाल का कर्ज लिया। मेनन ने सुल्तान के साथ मिलकर इंटीरियर डेकोरेशन का काम शुरू किया। शुरू-शुरू में उन्हें काफी परेशानियों का सामना करना पड़ा। पांच चीजें उन्हें कभी-कभी ज्यादा निराश करती थीं। व्यवसायिक शिक्षा का अभाव, आर्थिक रूप से कमजोर, नए भौगोलिक क्षेत्र में व्यवसाय शुरू करना, पहचान की कमी और भाषा की जानकारी। लेकिन उन्होंने अपना हौसला नहीं खोया। मेहनत करना उनकी खूबी थी और दिन-रात मेहनत करने लगे।
पांच साल की मेहनत के बाद ओमान के टॉप चार व्यवसायियों में हुई गिनती
पांच साल की कड़ी मेहनत के बाद साल 1984 में मेनन ओमान में टॉप चार व्यवसायियों में गिने जाने लगे। 1986-87 में उनकी 'द सर्विस एंड ट्रेड ग्रुप ऑफ कंपनीज' ओमान की टॉप परफॉर्मिंग कंपनियों में शामिल हो गई। यह कंपनी आज भी ओमान के बाजार में नंबर वन पर है। साथ ही, मेनन 2007-08 में फोर्ब्स द्वारा जारी की गई बिलिनेयर की फेहरिस्त में भी शामिल रह चुके हैं। मेनन की कुल संपत्ति 1.25 बिलियन डॉलर आंकी गई।

भारत में भी शुरू किया कारोबार
मेनन ने भारत में अपने व्यवसाय की शुरुआत बेंगलुरु से की। भारत में उन्होंने अपनी पत्नी शोभा के नाम पर 'शोभा डेवलपर्स' की शुरुआत की। इस कंपनी का टर्नओवर करीब 1500 करोड़ रुपए है। भारत में शोभा डेवलपर्स के प्रोजेक्ट्स 12 राज्यों में चल रहे हैं। शोभा डेवलपर्स 2006 में बांबे शेयर बाजार में सूचीबद्ध हुई। भारत और खाडी देशों में कंपनी के करीब 2,800 कर्मचारी हैं। मेनन शोभा रीयल्टी कंपनी के मानद अध्यक्ष हैं। मेनन ने बताया कि कंपनी भारत और खाड़ी देशों में अपना परिचालन बढाने की योजना बना रही है।

जनकल्याण के कामों से भी जुड़े हैं मेनन
मेनन जनकल्याण के कामों से भी जुड़े हुए हैं। केरल के किजाकेंचेरी में उन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्कूल, सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल और फाइव स्टार वृद्धा आश्रम का निर्माण करवाया है। उनके हॉस्पिटल में पिछले सात सालों में लगभग 3000 से ज्यादा गरीबी रेखा से नीचे रह रहे परिवारों के स्वास्थ्य का चेकअप, उनके बच्चों की पढ़ाई और वृद्धों को सहारा दिया गया। उनकी कंपनी द्वारा सीएसआर प्रोजेक्ट के अंतर्गत लगभग 2500 गरीब परिवारों को एडॉप्ट किया गया। जिन्हें मुफ्त खाना, आवास, शिक्षा, लड़कियों की शादी एवं बुजुर्गों के लिए वृद्धा आवास की सुविधाएं दी गई हैं।
भारत में खोलेंगे शिक्षण संस्थाएं
मेनन ओमान और भारत में शिक्षण संस्थाएं खोलने की योजना बना रहे हैं। उनका मानना है, जब आप ढेर सारी दौलत कमा लेते हैं, तो आपको सारा पैसा अपने परिवार पर ही खर्च करना नहीं करना चाहिए बल्कि इसका बड़ा हिस्सा समाज की भलाई में लगाना चाहिए। वह इसे परमार्थ कार्य नहीं, बल्कि समाज के प्रति जबावदेही मानते हैं।




http://money.bhaskar.com/news-hf/MON-PERS-PFPR-success-story-of-billionaire-pnc-menon-5013172-PHO.html

मंगलवार, 2 जून 2015

अरबों की संपत्ति के मालिक हैं ये नाई, आज भी काटते हैं लोगों के बाल


फोटोः बेंगलुरु के रहने वाले रमेश बाबू, चलाते हैं अपना सैलून
रतन टाटा, मुकेश अंबानी, मार्क जुकरबर्ग जैसी बड़ी हस्तियों का नाम आज दुनिया में कौन नहीं जानता। लेकिन इन नामचीन लोगों के बीच कईं नाम ऐसे हैं जिन्हें कम ही लोग जानते हैं। ये वो लोग हैं, जिन्होंने अपनी मेहनत के दम पर सफलता हासिल की। बेंगलुरु के रमेश बाबू भी इन्हीं लोगों में एक हैं। कभी वो मामूली नाई हुआ करते थे, लेकिन अपनी दूरदृष्टि, मेहनत और लगन से आज अरबों के मालिक हैं। इनके पास रोल्स रॉयस, मर्सडीज, बीएमडब्ल्यू और ऑडी जैसी लग्जरी कारों का काफिला है।

रमेश बाबू
रमेश बाबू की उम्र है 43 साल। बेंगलुरु के अनंतपुर के रहने वाले रमेश जब 7 साल के थे, तभी उनके पिता गुजर गए। पिता बेंगलुरु के चेन्नास्वामी स्टेडियम के पास अपनी नाई की दुकान चलाते थे। पिता की मौत के बाद रमेश बाबू की मां ने लोगों के घरों में खाना पकाने का काम किया, ताकि बच्चों का पेट भर सकें। उन्होंने अपने पति की दुकान को महज 5 रुपए महीना पर किराए पर दे दिया था।
शुरू की टूर एंड ट्रेवल्स कंपनी
रमेश बाबू तमाम कठिनाइयों के बावजूद पढ़ाई करते थे। 12वीं क्लास में असफल होने के बाद उन्होंने इंडस्ट्रियल ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट से इलेक्ट्रॉनिक्स में डिप्लोमा किया। 1989 में उन्होंने पिता की दुकान वापस लेकर उसे नए सिरे से चलाया। इस दुकान को मॉडर्न बनाकर उन्होंने खूब पैसे कमाए और एक मारुति वैन खरीद ली। चूंकि वह कार खुद नहीं चला पाते थे, इसलिए उन्होंने कार को किराए पर देना शुरू कर दिया। 2004 में उन्होंने अपनी कंपनी रमेश टूर एंड ट्रेवल्स की शुरुआत की।



आज रमेश बाबू के पास 256 कारों का काफिला है। इनमें 9 मर्सडीज, 6 बीएमडब्ल्यू, एक जगुआर और तीन ऑडी कारें हैं। वह रॉल्स रॉयस जैसी महंगी कारें भी चलाते हैं जिनका एक दिन का किराया 50,000 रुपए तक है। रमेश बाबू के पास 60 से भी ज्यादा ड्राइवर हैं। लेकिन आज भी उन्होंने अपना पुश्तैनी काम नहीं छोड़ा। वह आज भी अपने पिता के सैलून इनर स्पेस को चला रहे हैं, जिसमें वो हर दिन 2 घंटे ग्राहकों के बाल काटते हैं।
अमिताभ से लेकर शाहरुख तक हैं उनके क्लाइंट
लग्जरी टैक्सी सर्विस शुरू करने के बाद से रमेश बाबू के क्लाइंट की लिस्ट बढ़ती गई। अमिताभ बच्चन, ऐश्वर्या राय बच्चन से लेकर शाहरुख खान जैसी बॉलीवुड सेलेब्रिटी भी उनकी क्लाइंट लिस्ट में शामिल हैं।




कोलकाता और मुंबई से आते हैं क्लाइंट
रमेश बाबू रोज सुबह साढ़े 5 बजे अपने गैराज में जाते हैं। वहां गाड़ियों की देखरेख, बुकिंग की जानकारी लेकर साढ़े 10 बजे अपने ऑफिस पहुंचते हैं। पूरे दिन क्लाइंट और बिजनेस में बिजी रहने के बाद शाम को 5-6 बजे के बीच वह अपने सैलून जरूर जाते हैं। यहां भी उनके खास क्लाइंट उनका इंतजार कर रहे होते हैं। रमेश बाबू के मुताबिक, उनके ज्यादातर क्लाइंट्स बाल कटाने कोलकाता और मुंबई से आते हैं।



बच्चों को भी दे रहे हैं कटिंग टिप्स
रमेश बाबू अपनी दोनों बेटियों और एक बेटे को भी सैलून का काम सीखा रहे हैं। वो रोजाना बतौर टीचर उन्हें कटिंग टिप्स देते हैं। रमेश बाबू का कहना है कि यह एक तरह की जॉब है, जिसमें प्रोफेशनल होना जरूरी है। वो उन्हें अपने साथ सैलून भी ले जाते हैं, लेकिन अभी छोटी उम्र होने के कारण उन्हें वहां काम नहीं दिया जाता।



विजयवाड़ा में वेंचर खोलने की प्लानिंग
रमेश बाबू का अगला टारगेट दूसरे शहरों में अपना बिजनेस बढ़ाने की है। वो अपने सैलून और टैक्सी सर्विस को विजयवाड़ा में शुरू करने की प्लानिंग कर रहे हैं। उनका मानना है कि ऐसे शहरों में संभावनाएं हैं। इसलिए फोकस इन्हीं शहरों पर है। हैदराबाद जैसे बड़े शहरों में बिजनेस की सफलता के लिए काफी वक्त लगता है, लेकिन छोटे शहरों में आपके पास कई विकल्प होते हैं।


http://money.bhaskar.com/news/MON-MARK-FORX-the-rags-to-riches-story-of-a-billionaire-barber-ramesh-babu-5008481-PHO.html

कबाड़ से खड़ी की करोड़ों की कंपनी, अब विदेश में सप्लाई होते हैं इनके प्रोडक्ट

फोटोः जोधपुर के रहने वाले रितेश लोहिया

 कबाड़ को कबाड़ समझकर हम उसकी ओर ध्यान नहीं देते। कई बार चंद पैसों के लिए किसी कबाड़ी को बेच देते हैं या फिर घर के किसी कोने में पड़ा रहता है। लेकिन, पश्चिमी राजस्थान में जोधपुर शहर के रहने वाले रितेश लोहिया ने इसकी कीमत पहचानी। अपनी पत्नी के साथ मिलकर मंदी के दौर में कबाड़ से सामान बनाने की छोटी सी शुरुआत की। एक प्रोडक्शन कंपनी शुरू की, जिसमें वह कबाड़ से कुर्सियां, अलमारी, स्टूल, मेज, बैग बनाने लगे। आज उनका कारोबार 35 करोड़ रुपए का हो गया है। एक छोटे से आइडिया से उन्होंने इतना बड़ा कारोबार खड़ा कर लिया है, कि उनके प्रोडक्ट की डिमांड विदेशों तक है। आइए हम बताते हैं कि उन्हें ये आइडिया कैसे मिला....
कौन हैं लोहिया दंपति
प्रीति इंटरनेशनल के मालिक रितेश लोहिया (39) और सहकर्मी पत्नी प्रीति (37) जोधपुर में रहते हैं। शुरुआत में इनका हैंडीक्राफ्ट का व्यापार था, लेकिन कबाड़ से उत्पाद बनाने का आइडिया मिलने के बाद चीजें बदल गईं। अब वह फर्नीचर हैंडीक्राफ्ट बिजनेस पर ध्यान भी नहीं दे रहे हैं। अब दोनों हर वक्त कबाड़ के जुगाड़ में लगे रहते हैं। उनकी फर्म का व्यवसाय जो साल 2009 से पहले 16 करोड़ रुपए सालाना का था, अब 35 करोड़ रुपए पर पहुंच गया है।
ऐसे हुई शुरुआत, यूं मिला आइडिया
साल 2009 में व्यावसायिक मंदी चरम पर थी। सभी छोटे-बड़े व्यापारियों पर इसकी मार पड़ रही थी। फर्नीचर हैंडीक्राफ्ट्स का निर्यात करने वाली प्रीति इंटरनेशनल पर भी इसका प्रभाव पड़ा। उन्हीं बुरे दिनों में लोहिया दंपति के पास एक दिन डेनमार्क से एक ग्राहक आया। वह गोदाम में फर्नीचर देख रहा था कि उसकी नजर एक टिन पर पड़ी। गलती से किसी मजदूर ने उस पर कपड़े से बनी गद्दी रख दी थी। दूर से देखने पर वह किसी खास किस्म की कुर्सी नजर आ रही थी। ग्राहक को वह आइडिया इतना भाया कि उसने लोहिया दंपति से बेकार चीजों से ऐसे उत्पाद बनाने की राय दे डाली। बस फिर क्या था, लोहिया दंपति ने इस दिशा में काम करना शुरू कर दिया। टिन का कबाड़ बटोरा गया और हजारों की संख्या में जुगाड़ से बने स्टूल विदेश भेजे जाने लगे। आज हालात ये हैं कि अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया की मांग वह पूरी भी नहीं कर पा रहे हैं।
ऐसी कुर्सियां सबसे ज्यादा डिमांड में
घी या तेल के डिब्बों पर न कोई पेंट, न रंगरोगन। कपड़े की गद्दी बनाकर उस पर चिपकाई जाती है। रितेश के मुताबिक यह आइटम काफी डिमांडिंग है। वह कहते हैं कि पहले कबाड़ी 30 रुपए में टिन के ऐसे डिब्बे दे देते थे, लेकिन अब 100 रुपए में भी नहीं देते। हालांकि, वह मानते हैं कि यह अच्छा ही है। इससे कबाड़ियों की भी आमदनी बढ़ी है।






ये बनाते हैं उत्पाद
रितेश की कंपनी में सोफा, कुर्सियां, बार कुर्सी/टेबल, आलमारी, दरी, कारपेट, बेडशीट, तकिए जैसे तमाम घरेलू उत्पाद बनाए जाते हैं। लोहे, लकड़ी और जूट से बनी ये चीजें रितेश अपनी बोरानाडा स्थित यूनिट में तैयार करते हैं। जोधपुर के पास बासनी में उन्होंने अपनी एक और यूनिट लगा दी है, जहां टेक्सटाइल संबंधित उत्पाद बनते हैं। इनकी डिजाइन उनकी पत्नी प्रीति तैयार करती हैं। इस फर्म को हाल ही में कोरिया से 2,000 दरियों का ऑर्डर मिला है।
डिमांड कुछ ऐसी की अगर नहीं है कबाड़ , तो बनाना पड़ता है कबाड़ जैसे
वह कहते हैं विदेशों में ऐसी चीजों की जर्बदस्त मांग है। ऐसा भी होता है कि कभी कबाड़ वाली चीजें नहीं मिलतीं, तो नए सामान को ही कबाड़ की शक्ल देनी पड़ती है। रितेश को दरियों के ऑर्डर पूरा करने के लिए सेना के टेंट और दूसरे कपड़े नीलामी के दौरान खरीदने पड़े। मजदूरों से उन कपड़ों की कतरनें बनवाई गईं। माल और मजदूरी के बाद एक दरी पर खर्च आया तकरीबन 500 रुपए। जबकि कोरिया में एक-एक दरी की कीमत 2,000 रुपए मिलती है। रितेश की फर्म ऐसे सामान के हर महीने 35 कंटेनर उत्पाद अमेरिका, यूरोप, सिंगापुर, कोरिया, जर्मनी जैसे देशों में भेजती है। ऐसे हर उत्पाद पर एक टैग लगा होता है, जिस पर उत्पाद के निर्माण की पद्धति की पूरी जानकारी होती है।







http://money.bhaskar.com/news/MON-STA-RAJ-jodhpur-entrepreneur-create-millions-from-junk-latest-news-5007606-PHO.html

सोमवार, 25 मई 2015

6 तरीकेः महिलाएं भी घर बैठे कमा सकती हैं पैसा, पहले महीने से होगी कमाई



नई दिल्ली. दिल्ली के मयूर विहार में रहने वाली राधिका कपूर की शादी पिछले साल नवंबर में हुई थी। दो महीने बाद घर में रहकर वो बोर होने लगीं। अचानक उन्हें उनकी एक सहेली ने बताया कि वो घर बैठे अपना कुकिंग का बिजनेस शुरू कर सकती है और पैसा कमा सकती है। बस फिर क्या था राधिका ने कुकिंग को अपना करियर बना लिया। आज राधिका महीने के 90 हजार रुपए कमाती हैं। आमतौर पर महिलाएं घर और परिवार का ख्‍याल रखने के चक्कर में करियर के साथ-साथ इन चीजों को भी नजरअंदाज कर देती हैं, लेकिन निराश होने की जरूरत नहीं है। हम आपको बता रहे हैं कुछ ऐसे ही तरीके जिनसे महिलाएं घर बैठे कमाई कर सकती हैं। इन तरीकों को अपनाने के बाद पहले महीने से ही आप भी पैसा कमाना शुरू कर देंगी।
कैसे कमाएं 90 हजार
राधिका ने अपनी कुकिंग के जरिए मयूर विहार के एक गर्ल्स हॉस्टल में खाने की सप्लाई शुरू की। उन्होंने शुरुआत में 12 टिफिन के साथ ये सप्लाई शुरू की थी। आज उनके पास 60 टिफिन की डिलिवरी है। एक टिफिन पर 50 रुपए चार्ज करती हैं। इससे उनकी दिन की आमदनी 3000 रुपए है यानी महीने में 90 हजार रुपए। राधिका की ये कमाई पहले महीने से ही शुरू हो गई थी। हालांकि, पहले ये कमाई सिर्फ 18 हजार रुपए थी, लेकिन टिफिन की संख्या बढ़ने के साथ ही उनकी कमाई 90 हजार तक पहुंच गई। आप भी राधिका की तरह घर बैठे टिफिन सिस्‍टम शुरू कर सकती हैं। जो आपको अच्‍छी इनकम का मौका देता है।

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फ्रीलांसिंग राइटिंग
जरूरी नहीं किसी दफ्तर में आठ घंटे की नौकरी करने के बाद ही पैसा कमाया जाए। अगर आपके अंदर लिखने-पढ़ने का हुनर छुपा है तो उसे बाहर निकालें। इन हुनर के जरिए भी आप घर बैठे कमाई कर सकती हैं। आप किसी मैग्‍जीन, अखबार के लिए घर बैठकर आर्टिकल लिख सकती हैं। कई पत्रिका और अखबार सिटीजन जर्नलिस्ट कैटेगरी में आम लोगों को मौका देते हैं कि वो उनके लिए आर्टिकल्स लिखें। इसके लिए प्रति आर्टिकल 200 रुपए तक चार्ज किया जाता है। हालांकि, हर जगह के लिहाज से ये चार्ज अलग हो सकता है, लेकिन इससे आपकी कमाई होने लगेगी।

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मेकअप एंड ब्‍यूटी
आज के दौर में मेकअप एंड ब्‍यूटिशियन को महिलाओं ने सबसे ज्‍यादा रोजगार के तौर पर अपनाया है। शुरुआत एक छोटे से ब्‍यूटी पार्लर से की जा सकती है। भविष्य में आप बिजनेस को आगे भी बढ़ा सकती हैं। इसके लिए जरूरी नहीं कि आपके पास शॉप या अलग से कोई जगह हो। आप घर बैठे भी एक दो क्लाइंट को सेवा दे सकते हैं। इससे आपकी कमाई भी होती रहेगी और घर पर रहने से बोझ भी नहीं बढ़ेगा।


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ट्यूशन
अपनी पढ़ाई को समय के साथ भूल जाने से अच्‍छा है आप खुद शिक्षक बन जाएं और जो आपने सीखा है, वो दूसरों को भी पढ़ा सकें। घर पर ट्यूशन लेना एक बेहतरीन ऑप्‍शन है। इसमें ज्यादा वक्त भी खर्च नहीं होता और आप भी समय के साथ अपडेट रहेंगी। आजकल मेट्रो शहरों में एक बच्चे को पढ़ाने के लिए ट्यूशन सेंटर 500 से 1000 रुपए तक चार्ज करते हैं।



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ऑनलाइन सर्वे जॉब
बदलते समय के साथ ऑनलाइन सर्वे जॉब में लोगों की डिमांड पहले की अपेक्षा काफी बढ़ी है। ऐसे में आप ऑनलाइन सर्वे में थोड़ा समय देकर घर बैठे अच्‍छी इनकम कर सकती हैं। ज्यादातर कंपनियां आपको मौका देती हैं कि उनके प्रोड्क्टस के लिए आप लोगों के प्रिव्यू लें और पब्लिक डिमांड के मुताबिक सर्विस डिलिवरी की बारिकियां बताएं। सर्वे करके कंपनी को देने की एवज में आपको अच्छी-खासी रकम मिल सकती है। ये काम आप कहीं से भी कर सकते हैं। इसके लिए किसी कंपनी के ऑफिस जाने की भी जरूरत नहीं। आप सिर्फ ऑनलाइन उनसे संपर्क करके उनके लिए काम करना शुरू कर सकती हैं।


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हॉबी क्‍लासेस
आपको पेंटिंग करने, गिटार बजाने जैसी कोई भी हॉबी रही है तो आप दूसरों को सिखाकर अपने लिए रोजगार की राह बनाने के साथ अच्‍छी कमाई भी कर सकती हैं। हॉबी क्‍लासेस को पिछले कुछ दिनों में 23 फीसदी महिलाओं ने अपनाया है। इससे एक महीने के भीतर आप 25 हजार रुपए तक की कमाई कर सकती हैं। इसके लिए आपको रोजाना ट्यूशन देने की भी जरूरत नहीं है। हफ्ते में आप सिर्फ तीन से चार क्लास भी ले सकते हैं। इसके लिए प्रति व्यक्ति 1000 रुपए या उससे अधिक भी चार्ज किया जाता है।



http://money.bhaskar.com/news/MON-SME-OPP-women-can-earn-money-from-work-at-home-latest-4994148-PHO.html